पूना समझौता : प्रावधान एवं चुनौतियाँ

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अनुराग गौतम, सत्य प्रकाश राय

Abstract

 1909 और 1919 के अधिनियमों के माध्यम से मुसलमानों और सिखों सहित कई समुदायों को अलग मतदाता सूची प्रदान की गई। राष्ट्रवादी इतिहासकारों के अनुसार वास्तव में ब्रिटिश शासन का उद्देश्य हिंदुओं, मुसलमानों तथा अन्य अल्पसंख्यक समूहों आदि में फूट डालकर भारतीय एकता को कमजोर करना था। दलित समुदायों का राजनीतिक उभार 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में तेज हुआ। डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि दलित समुदाय भारत का वास्तविक अल्पसंख्यक वर्ग है जिसे पृथक निर्वाचन मंडल और राजनीतिक संरक्षण की आवश्यकता है। 1920 के बाद अंग्रेजों ने दलितों के प्रति अपनी नीति बदली क्योंकि उन्हें यह समझ आने लगा था कि गांधीजी के नेतृत्व में कांग्रेस को व्यापक जनसमर्थन मिल रहा था। इस पृष्ठभूमि में दलित नेताओं को गोलमेज सम्मेलनों में आमंत्रित किया गया। प्रथम सम्मेलन में अम्बेडकर और हिंदू महासभा के नेताओं ने दलित अधिकारों पर विचार-विमर्श किया। 1931 में शुरू हुए दूसरे गोलमेज सम्मेलन में महात्मा गांधी ने कांग्रेस की ओर से प्रतिनिधित्व किया और दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल का कड़ा विरोध किया। उनका मत था कि ऐसी व्यवस्था हिंदू समाज को विभाजित कर देगी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सभी वर्गों की प्रतिनिधि है और किसी भी जाति को विशेष राजनीतिक संरक्षण देना वे स्वीकार नहीं करेंगे। अम्बेडकर और गांधी के बीच मतभेद बढ़ने पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने 17 अगस्त 1932 को “साम्प्रदायिक निर्णय” (Communal Award) घोषित किया। इसमें दलितों को 20 वर्षों तक पृथक निर्वाचन मंडल और दोहरे वोट का अधिकार दिया गया। हालांकि यह व्यवस्था अम्बेडकर के लिए “अनमोल विशेषाधिकार” थी, गांधी ने इसे अंग्रेजों की “फूट डालो और राज करो” नीति बताया और इसके विरोध में 20 सितंबर 1932 से आमरण अनशन की घोषणा कर दी। हिंदू एवं दलित नेताओं के बीच लगातार वार्ताओं के बाद अंततः 24 सितंबर 1932  “पूना पैक्ट” के बाद अम्बेडकर ने पृथक निर्वाचन मंडल की मांग छोड़ने पर सहमति दे दी। पूना समझौता भारतीय इतिहास की एक निर्णायक घटना थी जिससे दलितों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ और भविष्य में सरकारी सेवाओं तथा अन्य क्षेत्रों में आरक्षण की व्यवस्था प्रारंभ हुई। यह समझौता उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है जितना लखनऊ समझौता मुसलमानों के लिए था। इस लेख के माध्यम से गांधी व अंबेडकर के मध्य संपन्न पूना समझौता जो कई महत्वपूर्ण बदलाव और द्वंद के पश्चात पूर्ण हुआ। यह लेख इस विषय में तत्कालीन आवश्यकता, चुनौतियों तथा इसके समाधान को जानने का प्रयास है।

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