जैन पांडुलिपियों में चित्रकला और लेखन कला का समन्वय
Main Article Content
Abstract
भारतीय ज्ञानपरंपरा में पांडुलिपियों ने आध्यात्मिक, धार्मिक और बौद्धिक विचारों के संवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जैन पांडुलिपियाँ इस परंपरा का विशिष्ट और उल्लेखनीय रूप हैं, जिनमें चित्रकला और लेखन कला का अद्भुत समन्वय दिखाई पड़ता है। 11वीं से 17वीं शताब्दी के मध्य निर्मित जैन पांडुलिपियाँ स्याही, सजावट, रंगों की सुस्पष्टता, अलंकरण, प्रतीकवाद और कलात्मक दृष्टिकोण के असाधारण संगम के कारण विशिष्ट मानी जाती हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र में जैन पांडुलिपियों में चित्र और अक्षर की अभिव्यक्तिपरक एकता को ऐतिहासिक, सौंदर्यशास्त्रीय, सांस्कृतिक तथा धार्मिक संदर्भों में विश्लेषित किया गया है।
अध्ययन में पाया गया कि जैन कलाकारों ने पांडुलिपियों में सांस्कृतिक संरक्षण को दृश्यात्मक सौंदर्य के साथ संयोजित करते हुए धर्म-प्रचार, आध्यात्मिक शिक्षा और समुदाय की सांस्कृतिक अस्मिता को सशक्त किया। रंग-योजना में लाल, सफेद, नीला और स्वर्ण जैसे रंगों का सार्थक उपयोग जैन-पांडुलिपि चित्रों को दर्शनीय बनाता है। साथ ही कथानक, तीर्थंकर चरित्र, कल्पसूत्र, कल्पकथाएँ, संक्षेप-चित्र और विषय-वस्तु लेखन एवं कला-शैली के केवल ग्रंथीय नहीं वरन् दृश्य-धार्मिक रूप को भी प्रतिपादित करते हैं। अध्ययन निष्कर्षतः यह स्पष्ट करता है कि जैन पांडुलिपियों में चित्र और लेखन कला के समन्वय से एक ऐसी विशिष्ट दृश्य संरचना निर्मित करती हैं जो भारतीय कला-इतिहास में अनुपम और अविस्मरणीय है।