"प्रेमचन्द के पत्रों का स्वरुप, प्रामाणिकता एवं प्रासंगिकता"

Main Article Content

रूबी शर्मा, सोनिया यादव

Abstract

पत्र मनोवैज्ञानिक दृष्टि से एक समवेग हैं, जो दूसरे के विचार पाकर उससे ताल-मेल या विरोध के लिये लिखे जाते हैं। दूसरी ओर अपने विचारों के सम्प्रेषण के लिए लिखे जाते हैं। कुछ रचनाकार पत्र लिखने में विशेष सावधानी बरतते हैं और वे अपने विचारों के गुम्फन के लिये सत्त प्रयत्नशील रहते हैं। निराला इस दिशा में विशेष जागरूक हैं। वे अपने पत्र लिखते समय कम से कम आठ-दस बार पत्र लिखकर फाड़ देते थे। इस दृष्टि से प्रेमचन्द को जागरूक पत्रों का पत्रीकार नहीं कहा जा सकता। वे अक्सर पत्र लिखते रहते थे और इस दिशा में भी सचेत थे कि उनके पास आये किसी पत्र का उत्तर दिये बिना न रह जाए। वे एक ही बार में अपनी बात कह देते थे। इस कारण प्रेमचन्द के पत्रों में भाषा की कलात्मकता, भावों का गुम्फन और अन्य किसी प्रकार की साज-सज्जा देखने को नहीं मिलती, और उसे सपाट बयानी कहा जा सकता है। उनके साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं पारिवारिक सभी प्रकार के विचार उनके पत्रों में साफ दिखाई पड़ते हैं। वह एक प्रकार की सपाट बयानी कही जा सकती है। पत्रों की प्रामाणिकता के आधार के रूप में कथ्य, तिथि, सन्दर्भ और भाषा को स्वीकार किया जाता है। पत्रों का लेखक किसी न किसी सन्दर्भ को लेकर पत्र लिखता है या उत्तर देता है। सामान्यतः पत्र दूसरे तक अपनी बात को पहुँचाने के लिए लिखे जाते हैं। उत्तर के रूप में लिखी गयी समस्या के निराकरण के लिये लिखे जाते हैं। जब पत्रों का उत्तर प्रति उत्तर के रूप में आदान-प्रदान नहीं होता तो लेखक को पत्र प्रामाणिक सन्दर्भ बन जाते है। प्रेमचन्द साहित्य का अपना महत्व है। प्रेमचन्द पहले उपन्यासकार थे. जिन्होंने अपने साहित्य की कथा जन-जीवन से चुनी है। कृति के भीतर कृतिकार दिखाई दे ही जाता है। उनकी कृतियों पर उनके पत्रों का स्पष्ट प्रतिबिम्ब दिखाई देता हैं प्रेमचन्द की चिट्ठियों में उनके विचार और उनके व्यक्तित्व की झलक है। एक प्रकार का भोलापन है, एक तरह की सादगी है, अपने पत्रों में प्रेमचन्द पूर्णरूप से नजर आते हैं।

Article Details

Issue
Section
Articles