लाहौल–स्पीति के बौद्ध मठों में धार्मिक पर्यटन: सांस्कृतिक धरोहर, संरक्षण एवं सामुदायिक सहभागिता का आलोचनात्मक अध्ययन

Main Article Content

गलदन सेंगें

Abstract

लाहौल–स्पीति के बौद्ध मठों को मात्र दर्शनीय स्थलों के रूप में नहीं, बल्कि जीवित धार्मिक संस्थाओं, ज्ञान-संप्रेषण के केंद्रों तथा स्थानीय समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति के वाहकों के रूप में समझना आवश्यक है। प्रस्तुत शोध-पत्र में ताबो एवं की जैसे प्रसिद्ध केंद्रों के साथ-साथ धनकर, पिन घाटी के मठों तथा लाहौल की मठ-परंपराओं का विवेचन किया गया है। त्रिलोकीनाथ को हिंदू-बौद्ध साझा श्रद्धास्थल के रूप में विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है। अध्ययन का केंद्रीय तर्क यह है कि मठों की धार्मिक जीवंतता, सांस्कृतिक प्रामाणिकता तथा स्थानीय सामुदायिक संबंध सुरक्षित रहते हुए ही पर्यटन की दीर्घकालिक उपयोगिता सुनिश्चित की जा सकती है। केवल पर्यटक-संख्या अथवा स्थापत्य के दर्शनीय पक्ष को सफलता का मापदंड मान लेने से पूजा की मर्यादा एवं स्थानीय निवासियों की आवश्यकताएँ उपेक्षित रह सकती हैं। प्रकाशित शोध-लेखों तथा आधिकारिक स्थल-विवरणों के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि संरक्षण एवं सामुदायिक भागीदारी दोनों अनिवार्य शर्तें हैं। यह लेख मठों की स्वायत्तता एवं स्थानीय आजीविका के बीच एक व्यावहारिक तथा संतुलित संबंध स्थापित करने का प्रस्ताव प्रस्तुत करता है।

Article Details

Issue
Section
Articles