वर्तमान संकटकालीन विश्व में बौद्ध सांस्कृतिक मूल्यों की प्रासंगिकता
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वर्तमान विश्व युद्ध, जलवायु-परिवर्तन, आर्थिक विषमता, विस्थापन, सांप्रदायिक तनाव, डिजिटल दुष्प्रचार और मानसिक असुरक्षा जैसे परस्पर जुड़े संकटों से गुजर रहा है। यह शोध-पत्र प्रतिपादित करता है कि बौद्ध सांस्कृतिक मूल्य केवल निजी आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं हैं, बल्कि व्यक्ति, समाज और वैश्विक संस्थाओं के नैतिक पुनर्गठन के लिए उपयोगी आधार प्रदान कर सकते हैं। चार आर्य सत्य संकट को दुःख, उसके कारण, निरोध की संभावना और उपचार-पथ के रूप में समझने की विश्लेषणात्मक पद्धति देते हैं। करुणा पीड़ित के प्रति सक्रिय उत्तरदायित्व जगाती है, मैत्री शत्रु-निर्माण की राजनीति को चुनौती देती है, अहिंसा साधन और लक्ष्य की एकता स्थापित करती है, मध्यम मार्ग अतिवादी उपभोग तथा कठोर वंचना—दोनों से बचने की दिशा देता है, जबकि प्रतीत्यसमुत्पाद मनुष्य, समाज और प्रकृति की परस्पर निर्भरता को स्पष्ट करता है। लेख पालि निकायों, धम्मपद तथा आधुनिक बौद्ध नैतिक चिंतन के व्याख्यात्मक अध्ययन पर आधारित है। निष्कर्षतः इन मूल्यों की प्रासंगिकता तभी सार्थक होगी, जब उन्हें कर्मकांड या भावनात्मक उपदेश तक सीमित न रखकर सार्वजनिक नीति, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, पर्यावरणीय न्याय, संवाद और शांति-निर्माण में संस्थागत रूप दिया जाए।
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