उपनिषदीय धर्म मीमांसा
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Abstract
धर्म शब्द का अर्थ है धारण करना, बनाए रखना या पुष्ट करना। सम्पूर्ण विश्व धर्म से ही शासित हो रहा है। प्राकृतिक नियम को धर्म रूप में परिभाषित किया जा सकता क्योंकि इस नियम में बंधकर ही सूर्य, चंद्रमा, तारामंडल इत्यादि अपने नियत पथ का गमन करते हैं, दूसरी ओर मानव और उसके परिवेश अर्थात् समाज को शासित और नियमित करने का कार्य धर्म करता है जिससे दोनों की उर्ध्व-गति और समृद्धि सुनिश्चित होता है। धर्म का आरंभिक और मूल प्रतिपादन वेद में किया गया है और इस भारतीय धर्म चिंतन का उत्कर्ष उपनिषदों में प्राप्त होता है। मानव जाति के आध्यात्मिक इतिहास में उपनिषद् साहित्य उस विस्तृत अध्याय की भांति है जो युग-युगांतर से भारतीय धर्म-दर्शन और जीवन को निरंतर अनुशासित करता आ रहा है। ब्रह्मज्ञान के अधिकारी को साधन-चतुष्ट्य संपन्न होना ही चाहिए। धर्मनिष्ठ अधिकारी ही अज्ञाननिवृत्ति तथा परमानंद प्राप्तिरूप प्रयोजन की सिद्धि कर सकता है। उपनिषद् हमें धर्मानुसार त्यागपूर्वक भोग का उपदेश देता है।