‘चिति’ और ‘विराट’ की अवधारणा: पंडित दीनदयाल उपाध्याय के राष्ट्र एवं समाज-दर्शन का विश्लेषण
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Abstract
भारतीय राजनीतिक चिंतन की आधुनिक परंपरा में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का स्थान उन विचारकों में है जिन्होंने स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारत की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दिशा के प्रश्न को भारतीय सभ्यतागत अनुभव, सांस्कृतिक चेतना और दार्शनिक परंपरा के आधार पर समझने का प्रयास किया। उनका प्रतिपादित एकात्म मानववाद केवल व्यक्ति और समाज के संबंध की दार्शनिक व्याख्या नहीं है, बल्कि राष्ट्र, संस्कृति, राज्य, समाज तथा विकास के पारस्परिक संबंधों का एक समग्र वैचारिक प्रतिमान प्रस्तुत करता है। इस प्रतिमान में ‘चिति’ और ‘विराट’ की अवधारणाएँ विशेष महत्त्व रखती हैं। उपाध्याय के अनुसार ‘चिति’ राष्ट्र की अंतर्निहित आत्मा, सांस्कृतिक प्रकृति और मूल्याधार का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि ‘विराट’ उस चेतना से प्रेरित समाज की संगठित, सक्रिय और सृजनात्मक शक्ति है। इस प्रकार ‘चिति’ राष्ट्र के अस्तित्व को दिशा और वैधता प्रदान करती है तथा ‘विराट’ उस दिशा को सामाजिक-राजनीतिक क्रियाशीलता में रूपांतरित करता है।
प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य ‘चिति’ और ‘विराट’ की अवधारणाओं का दार्शनिक, ऐतिहासिक तथा समाजशास्त्रीय विश्लेषण करना है। अध्ययन में यह प्रतिपादित किया गया है कि उपाध्याय का राष्ट्र-दर्शन राष्ट्र को केवल राजनीतिक राज्य, भौगोलिक सीमा अथवा नागरिकों के संविदात्मक समूह के रूप में स्वीकार नहीं करता, बल्कि उसे सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक संगठन की दीर्घकालिक प्रक्रिया के रूप में देखता है। लेख यह भी परीक्षण करता है कि ‘चिति’ और ‘विराट’ के माध्यम से उपाध्याय व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के मध्य किस प्रकार की एकात्मता स्थापित करना चाहते हैं। साथ ही, इस वैचारिक प्रतिमान की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए सांस्कृतिक बहुलता, आधुनिक लोकतंत्र, संवैधानिक नागरिकता तथा सामाजिक विविधता के संदर्भ में इसकी संभावनाओं और सीमाओं का परीक्षण किया गया है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि ‘चिति’ और ‘विराट’ भारतीय राजनीतिक चिंतन में सांस्कृतिक आधार और सामाजिक क्रियाशीलता के संबंध को समझने का एक महत्त्वपूर्ण स्वदेशी वैचारिक ढाँचा प्रस्तुत करते हैं; तथापि आधुनिक बहुलतावादी लोकतंत्र में उनकी व्याख्या को समावेशी, संवादात्मक और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप विकसित करना आवश्यक है।