एकात्म मानववाद से अंत्योदय तक: पंडित दीनदयाल उपाध्याय के राष्ट्र एवं समाज निर्माण संबंधी विचार
Main Article Content
Abstract
भारत को 1947 में स्वतंत्रता मिलने के साथ ही उसके सामने राष्ट्र-निर्माण, सामाजिक पुनर्गठन, आर्थिक विकास और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े हो गए थे। इस संक्रमणकालीन दौर में अलग-अलग राजनीतिक-वैचारिक धाराओं ने भारतीय समाज और राज्य के भविष्य को लेकर अपने-अपने दृष्टिकोण सामने रखे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन इसी स्वातंत्र्योत्तर वैचारिक परिवेश में पल्लवित हुआ। उन्होंने भारतीय संस्कृति और सामाजिक परंपराओं को केंद्र में रखकर राष्ट्र तथा समाज के पुनर्निर्माण की एक दृष्टि विकसित करने का प्रयत्न किया, जो आगे चलकर व्यवस्थित रूप से 'एकात्म मानववाद' के नाम से जानी गई (Upadhyaya, 1965)। एकात्म मानववाद में मनुष्य को महज़ आर्थिक या राजनीतिक इकाई मानने के बजाय उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक—इन चारों पक्षों के समन्वित विकास पर ज़ोर दिया गया। इस दृष्टिकोण में व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और मानवता को एक-दूसरे से गुँथी हुई इकाइयों के रूप में देखा गया। इसी विचार-सरणी की सामाजिक-आर्थिक शाखा के रूप में 'अंत्योदय' की संकल्पना उभरती है, जिसमें समाज के सबसे पीछे खड़े व्यक्ति के कल्याण को विकास और शासन की सार्थकता कसौटी माना गया (Upadhyaya, 1965; Sharma, 2021)।
प्रस्तुत शोध-पत्र ऐतिहासिक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति अपनाते हुए दीनदयाल उपाध्याय के राष्ट्र और समाज-निर्माण संबंधी विचारों की पड़ताल करता है। इसमें उनके जीवन-वृत्त और वैचारिक निर्माण, स्वातंत्र्योत्तर भारत की तत्कालीन परिस्थितियों, भारतीय जनसंघ के संगठनात्मक विकास में उनकी भूमिका, एकात्म मानववाद की दार्शनिक बुनावट तथा अंत्योदय की अवधारणा को विश्लेषित किया गया है। साथ ही उनके राष्ट्रवाद, भारतीय संस्कृति-बोध, सामाजिक समरसता और आर्थिक चिंतन को उस दौर के ऐतिहासिक संदर्भ में रखकर समझने की कोशिश की गई है। अध्ययन का लक्ष्य केवल विचारों का वर्णन करना नहीं, बल्कि स्वातंत्र्योत्तर भारत के वैचारिक इतिहास में उनके अवदान का समालोचनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करना है। अध्ययन यह निष्कर्ष सामने रखता है कि दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन आज़ादी के बाद भारत में उभरे वैकल्पिक राष्ट्र-निर्माण प्रयासों की एक सशक्त कड़ी था, जिसने भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि के आधार पर व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के आपसी संबंधों को नए सिरे से गढ़ने का प्रयास किया।