अलका सरावगी के कथा-साहित्य में शहरी मध्यवर्ग और प्रवासी मारवाड़ी समाज का समाजशास्त्रीय विश्लेषण
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Abstract
अलका सरावगी समकालीन हिंदी साहित्य की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट कथाकार हैं, जिनके कथा-साहित्य में उत्तर-औपनिवेशिक भारतीय समाज, विशेषतः शहरी मध्यवर्ग तथा प्रवासी मारवाड़ी समुदाय का बहुआयामी और यथार्थपरक चित्रण मिलता है। उनके उपन्यास—विशेषतः “कलि-कथा : वाया बाइपास”—सामाजिक परिवर्तन, ऐतिहासिक स्मृति, वैश्वीकरण, सांस्कृतिक अस्मिता, वर्गीय संरचना तथा पारिवारिक संस्थाओं के विघटन जैसे जटिल समाजशास्त्रीय आयामों को गहराई से उद्घाटित करते हैं।
सरावगी का लेखन केवल कथात्मक प्रस्तुति नहीं, बल्कि सामाजिक इतिहास और सांस्कृतिक मनोविज्ञान का सूक्ष्म दस्तावेज भी है, जिसमें व्यक्ति और समुदाय के बीच अंतर्संबंधों का सजीव विश्लेषण मिलता है।
शहरी मध्यवर्ग के संदर्भ में उनके साहित्य में उपभोक्तावाद, आर्थिक उदारीकरण के प्रभाव, सामाजिक गतिशीलता, जीवन-शैली में परिवर्तन तथा अस्तित्वगत असुरक्षा-बोध जैसे तत्व प्रमुखता से उभरते हैं। यह मध्यवर्ग एक ओर आधुनिकता और वैश्विक संस्कृति से प्रभावित है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक मूल्यों और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच द्वंद्व की स्थिति में भी है।
दूसरी ओर, प्रवासी मारवाड़ी समाज के चित्रण में सरावगी ने विस्थापन, सांस्कृतिक स्मृति, आर्थिक सशक्तता, सामाजिक बहिष्करण तथा पहचान-संकट जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों को उठाया है। कोलकाता जैसे महानगर में स्थापित मारवाड़ी समुदाय का जीवन उनके उपन्यासों में न केवल आर्थिक सफलता की कहानी है, बल्कि सांस्कृतिक अनिश्चितता और सामाजिक द्वैध का भी प्रतिबिंब है।
इस समुदाय की भाषा, परंपराएँ और सामाजिक संरचना एक ओर अपनी जड़ों से जुड़ी रहती हैं, तो दूसरी ओर स्थानीय परिवेश के साथ अंतःक्रिया करते हुए नए रूप भी ग्रहण करती हैं।
प्रस्तुत शोध-पत्र में अलका सरावगी के कथा-साहित्य का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि उनका लेखन भारतीय समाज के संक्रमणकालीन यथार्थ को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उनके पात्र और कथानक आधुनिक भारतीय समाज में उत्पन्न वर्गीय, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक जटिलताओं को उजागर करते हैं।
इस प्रकार, सरावगी का साहित्य न केवल हिंदी कथा-साहित्य की परंपरा को समृद्ध करता है, बल्कि समाजशास्त्रीय विमर्श को भी नई दिशा प्रदान करता है।