गाँधी के सामाजिक एवं राजनीतिक दर्शन में अहिंसा की भूमिका: एक समीक्षात्मक अध्ययन
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Abstract
अहिंसा भारतीय सामाजिक एवं राजनीतिक चिंतन की एक महत्वपूर्ण दार्शनिक अवधारणा है, जिसका विकास जैन, बौद्ध तथा वैदिक-उपनिषदिक परंपराओं में विभिन्न रूपों में हुआ। आधुनिक काल में एम. के. गांधी ने अहिंसा को केवल व्यक्तिगत नैतिकता अथवा धार्मिक आचरण तक सीमित न रखकर सामाजिक परिवर्तन, राजनीतिक संघर्ष और जनसंगठन का प्रभावी साधन बनाया। गांधी के लिए अहिंसा निष्क्रियता या कायरता का पर्याय नहीं थी, बल्कि सत्य, प्रेम, आत्मसंयम, त्याग और नैतिक साहस पर आधारित सक्रिय शक्ति थी। उन्होंने सत्याग्रह, असहयोग, सविनय अवज्ञा, रचनात्मक कार्यक्रम तथा स्वराज की अवधारणाओं को अहिंसा के साथ जोड़कर एक वैकल्पिक राजनीतिक दर्शन प्रस्तुत किया। प्रस्तुत शोध-पत्र में सामाजिक एवं राजनीतिक दर्शन में अहिंसा की भूमिका का समीक्षात्मक अध्ययन किया गया है। इसमें अहिंसा की वैचारिक एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि, गांधी के अहिंसा-दर्शन, सत्य और अहिंसा के संबंध, सत्याग्रह के राजनीतिक स्वरूप, सामाजिक समरसता, लोकतंत्र, मानवाधिकार, न्याय तथा समकालीन विश्व में अहिंसा की प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया है। साथ ही अहिंसा की सीमाओं और उसके समक्ष उपस्थित व्यावहारिक चुनौतियों पर भी आलोचनात्मक दृष्टि डाली गई है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि हिंसा, युद्ध, सामाजिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक असहिष्णुता से प्रभावित वर्तमान विश्व में अहिंसा केवल गांधी के युग की राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण, लोकतांत्रिक और मानवीय समाज के निर्माण की एक महत्वपूर्ण दार्शनिक आधारशिला है।