मध्यकालीन मेवाड़ (9वीं–16वीं शताब्दी) में मुद्रा का जीवनचक्र: उत्पादन, प्रचलन एवं संचयन का मुद्राशास्त्रीय विश्लेषण

Main Article Content

हिमांशु मीणा

Abstract

मध्यकालीन मेवाड़ (9वीं–16वीं शताब्दी) के आर्थिक इतिहास की पुनर्रचना में मुद्राशास्त्रीय साक्ष्यों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण, परंतु अधिकांशतः विवरणात्मक रही है। प्रचलित अध्ययन परंपराओं ने मुद्रा को एक स्थिर ऐतिहासिक वस्तु के रूप में देखा और केवल उसके शिल्प, प्रतीक तथा धातुगत विवरणों पर विमर्श किया। यह शोधपत्र इस विवरणात्मक परंपरा से विमुक्त होकर मुद्रा को एक गतिशील, सतत एवं परिवर्तनशील आर्थिक-सामाजिक इकाई के रूप में स्थापित करता है। शोध की मूल समस्या यह है कि मेवाड़ की मुद्राओं के 'उत्पादन', 'प्रचलन' एवं 'संचयन' के अंतर्संबंधों को एक सतत जीवनचक्र के रूप में किसी ने व्यवस्थित रूप से विश्लेषण नहीं किया। वर्तमान शोध का प्रमुख उद्देश्य गुहिल एवं सिसोदिया शासककाल में मुद्रा के जन्म (टकसालीय उत्पादन), उसके सक्रिय जीवन (बाजार, व्यापार एवं कर-प्रणाली में प्रचलन) तथा उसके निष्क्रिय अवस्था (मंदिर, मुद्रा-निधि एवं संकटकालीन संचयन) की परस्पर निर्भरता को स्थापित करना है। अभिलेखागत, मुद्राशास्त्रीय एवं पुरातात्त्विक प्राथमिक स्रोतों के विश्लेषणात्मक अध्ययन के आधार पर यह शोध सिद्ध करता है कि मेवाड़ की मुद्रा केवल राजनीतिक सत्ता का प्रतीक नहीं, अपितु एक जीवंत आर्थिक प्रवाह का वाहक थी, जिसका जीवनचक्र राजनीतिक परिवर्तनों, सैनिक संकटों एवं व्यापारिक गतिविधियों से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता था। शोध का नवीन योगदान 'मुद्रा-जीवनचक्र प्रवाह मॉडल' का प्रतिपादन है, जो भारतीय उप-महाद्वीप के क्षेत्रीय मुद्राशास्त्र में एक नवीन विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण स्थापित करता है।

Article Details

Issue
Section
Articles