भक्तिकाल में जाति विरोधी चेतना: सामाजिक समता का आध्यात्मिक विमर्श।
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Abstract
भक्ति आंदोलन मध्यकाल का वह सामाजिक आंदोलन कहा जा सकता है जिसने समाज में आध्यात्मिक समानता को स्थापित करने का प्रयास किया। ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति एवं मानवता स्थापित करने वाला यह आंदोलन भारत के विभिन्न हिस्सों में फैला। भक्ति आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक समानता पर आधारित था। समाज में व्याप्त असमानता पर विरोध जताते हुए भक्ति संतों ने ईश्वर की दृष्टि में सभी को समान बताया एवं समाज में, प्रेम, सहिष्णुता और भाईचारा स्थापित करने की पेरवी की। 7 वी से 17 वी शताब्दी के बीच उभरे इस आंदोलन को सामाजिक – धार्मिक आंदोलन भी कहा जाता है। प्रस्तुत शोध पत्र भक्तिकाल के उन महान संतों के विचारों पर प्रकाश डालता है जिन्होंने सामाज की आखिरी पंक्ति के लोगों को आध्यात्मिक समानता का अवसर प्रदान कराया। इन प्रमुख संतों ने भारतीय समाज में स्थापित उंच- नीच के भेदभाव पर प्रहार करते हुए समानता और मानवता की बात कही। इस शोध पत्र में जिन प्रमुख संतों की चर्चा की गई है वे हैं – संत कबीर, संत चौखामेला, संत रविदास एवं संत तुकाराम।