अस्पृश्यता, सफाई कामगार व संवैधानिक प्रावधान का निहितार्थ

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सुमित उज्जैनवाल

Abstract

भारतीय लोकतंत्र में यह बात तो तय है कि जब हाशिये पर पड़े लोग अपने अस्तित्व तथा सम्मान के लिए खुद हंगामा - संघर्ष नहीं करते, उनकी सुध लेने उनके दरवाजे तक कोई नहीं जाता। सफाई कामगारों (अपमार्जकों) ने जब आवाज बुलंद की, टोकरियाँ जलायी, यात्राएँ निकाली, तब ऊपर के हलकों में हलचल होनी शुरू हुई।

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