हिन्दू अस्पृश्य जातियाँ: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समग्र अध्ययन
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Abstract
मूलतः ‘पहचान’ (आईडेंटटि) के मुद्दे पर आरम्भ होने वाले विवाद का जुड़ाव सीधे सीधे हमारे भारतीय समाज की पदसोपानीय व्यवस्था की ओर इशारा करता है। जाति-व्यवस्था देश, जागृति, संगठन और स्वतंत्रता की सबसे बड़ी दुश्मन है।[1] इसके रहते हुए कोई देश लम्बे समय तक स्वतंत्र नहीं रह सकता न ही ऐसे देश में स्थायी शांति रह सकती है। इस आलेख में भंगी, वाल्मीकि, मेहतर डोम आदि नामों की उत्पत्ति पर गंभीरता से विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इन तमाम पहचान से जुड़े नामों को मूल रूप से अम्बेड़करवादी विचारधारा के जानकारों के तर्कों, संघप्रचारक (अमीचन्द शर्मा, डॉ. विजय सोनकर शास्त्री), तथा आज के युग में सफाई कामगार समुदाय के लिए कार्य कर रहे मुक्ति दूतों के विश्लेषण के साथ प्रस्तुत किया गया है। इन दोनों ही वैचारिक गु्रपों ने इतिहास तथा सामाजिक मानोविज्ञान द्वारा जो भी तर्क दिये उनका उपयोग किया है।
[1] जब से प्राचीन संस्कृत पाठों के अध्ययन के लिए आलोचना की आधुनिक ऐतिहासिक तथा भाषा वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग किया जाने लगा है। तब से ऋग्वेद के आधार पर पूर्व वैदिक समाज की बहुत सारी व्याख्याएँ प्रस्तुत की गई है। लेकिन ऋग्वेदिक समाज की तस्वीर आज भी धुंधली और विवादस्पद ही है। हाल में 10 वर्षों की अल्पावधि में जी.एस. धुर्ये आर.एस. शर्मा तथा रोमिला थापर इन तीन विख्यात द्विवानों ने इस विषय से संबंधित अपने प्रबंध प्रकाशित