भारतीय ज्ञान-परम्परा में शिवत्व का अन्तःसम्बन्ध

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Swasti Sharma

Abstract

ज्ञान-परम्परा मुख्य रूप से दो परम्पराओं के माध्यम से विशेषतया विकसित हुई है- आगम-परम्परा एवं निगम-परम्परा। जिस प्रकार वैदिक परम्परा के सिद्धान्तों का आचार आदि को प्रसृत करने में महत्त्वपूर्ण स्थान है, उसी प्रकार ही आगम-परम्परा भी भारतीय ज्ञान एवं आचार आदि विषयों का मुख्य स्रोत है। ये दोनों परम्पराएँ सिद्धान्त एवं साधना को एक साथ प्रवाहित करती हैं। नैगमिक अर्थात् वैदिक सिद्धान्त एवं साधना के मूल में ‘वेद’ हैं और आगमिक अथवा तान्त्रिक सिद्धान्त एवं साधना के उद्गम के रूप में ‘तन्त्र’ हैं। पौराणिक काल में शैव-धर्म की उत्पत्ति का मूल आगम हैं।


वस्तुतः इस ’तन्त्र’ शब्द के अर्थ की विशिष्टता है कि इसका अध्याहार न केवल विभिन्न भारतीय शास्त्र-परम्पराओं में ही किया गया है अपितु आधुनिक ग्रन्थों (समाजशास्त्र, विज्ञान आदि) में भी अनेक स्थलों पर किसी समन्वयात्मक या सैद्धान्तिक अर्थ को प्रकट करने हेतु इसका प्रयोग किया गया है, यथा- ज्ञान-तन्त्र, व्याकरण-तन्त्र, अगद-तन्त्र, रसायन-तन्त्र, प्रजातन्त्र, लोकतन्त्र, जनतन्त्र, पाचन-तन्त्र, प्रजननतन्त्र इत्यादि।


इस शब्द से सम्बन्धित दार्शनिक अर्थ का बोध न होने के कारण समाज में दीर्घकाल से इसका भ्रामक अर्थ चला आ रहा है जिसका अर्थ जादू-टोना इस रूप में समझा जाता है। जबकि यह एक सम्पूर्ण अर्थ का बोधक है। जिसे अंगेजी में सिस्टम कहा जा सकता है। ‘तन्त्र’ शब्द का विशेष अर्थ है- ‘परमशिव’ का स्वेच्छया अपने स्वातन्त्र्य से अपने को संकुचित कर जड-चेतन के रूप में स्फुरित होना, पुनः स्वोपायों के द्वारा अपने को इस संकोच को हटा कर स्वयं को अपने विस्तृत या पूर्णरूप में स्वस्थ करना है। परमशिव के विश्वरूप में स्फुरित और फिर अपने रूप में स्वस्थ होने की प्रक्रिया ही तन्त्रशास्त्र का प्रतिपाद्य विषय है। इस प्रकार तन्त्र साक्षात्कार की एक विशेष व्यवस्था है, यह कहा जा सकता है।

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