प्रतिभा-वाक्यार्थवाद का स्वरूप
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Abstract
मानव का समग्र भाषिक व्यवहार वाक्य से ही प्रचलित होता है। अनेक वर्ण मिलकर अर्थवान शब्द का निर्माण करते हैं परन्तु सार्थक होने पर भी सभी शब्दों में प्रयोग की योग्यता नहीं होती है। उनमें प्रयोग की योग्यता तभी आती है जब वे विभक्ति अथवा प्रत्यय से युक्त पदरूप में व्युत्पन्न होकर किसी वाक्य के सार्थक अङ्ग के रूप में प्रयुक्त नहीं होते हैं। वाक्य वर्णों के समूहरूप पद से घटित एक ऐसी भाषिक इकाई है जो एक समन्वित भाव को सम्पूर्णता में अभिव्यक्त कर सकता है। प्राचीन काल से ही वाक्य के साथ-साथ वाक्यार्थ पर भी विचार किया गया है। प्राचीन अनेक आचार्यों ने वाक्यार्थ को समक्ष रखकर ही वाक्य पर विचार किया है। पदों के समूहरूप वाक्य से ही वाक्यार्थ का बोध होता है। अतः पद के लक्षण के अनन्तर वाक्य का लक्षण किया गया है। वाक्य के निर्माण में इस प्रकार के पदों के समूह की अपेक्षा होती है जिनमें से किसी एक पद या किन्हीं एक से अधिक पदों का उच्चारण न होने पर भी वाक्य में विद्यमान अन्य पदों में आकांक्षा बनी रहे और वहीं यदि वाक्य के सभी पदों के युगपत् उच्चरित हो जाने पर किसी प्रकार की कोई भी आकांक्षा न रहे। उदाहरण के लिए ‘श्यामो घटमानयति’ इस वाक्य में प्रयुक्त पदों के अलग-अलग उच्चारण करने पर भी सभी में आकांक्षा बनी रहती है तथा इससे आकांक्षारहित अर्थ का बोध नहीं होता परन्तु सम्पूर्ण वाक्य को एक साथ कहने से अर्थसम्बन्धी आकांक्षा का नाश हो जाता है। यदि वहीं किन्हीं पदों के समूह के उच्चरित होने के पश्चात् भी अर्थसम्बन्धी आकांक्षा का नाश नहीं होता तो उस पदों के समूह को वाक्य नहीं कह सकते।वार्तिककार के मत में अवयव, कारक और विशेषणसहित आख्यात ही वाक्य होता है।भाष्यकार के अनुसार विशेषणयुक्त आख्यात ही वाक्य होता है क्योंकि उपर्युक्त अवयव, कारक तथा विशेषण क्रिया में विशेषण के रूप से ही भासित होते हैं और विशेष्य क्रिया होती है।साथ ही ये एक तिङ् वाले पद या पदसमूह को वाक्य मानते हैं। जिस स्थान पर तिङन्त पदमात्र का प्रयोग होता है, वहाँ भी कारक का आक्षेप हो जाता है। जैसे ‘प्रविश’ इस पद के प्रयोग होने पर ‘गृहम्’ इस कारक का स्वयं आक्षेप हो जाता है। पतञ्जलि कात्यायन के वाक्य के लक्षण को अपूर्व के नाम से अभिहित करते हैं।इससे यह भी ज्ञात होता है कि वाक्य के लक्षण के संबंध में कात्यायन ने गहन विचार किया था।