समकालीन हिंदी साहित्य में बौद्ध चेतना
Main Article Content
Abstract
21वीं सदी का हिंदी साहित्य सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक परिवर्तन के व्यापक संदर्भ में विकसित हो रहा है। वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद, तकनीकी विस्तार, पहचान-आधारित संघर्ष, सामाजिक असमानता और मानसिक विखंडन ने साहित्य को नई दृष्टि और संवेदना प्रदान की है। ऐसे संक्रमणकालीन समय में बौद्ध धर्म के सिद्धांतकरुणा, समता, अनित्य, मध्यम मार्ग और प्रज्ञा समकालीन हिंदी साहित्य को एक वैकल्पिक नैतिक और दार्शनिक आधार प्रदान करते हैं। यह लेख 21वीं सदी के हिंदी साहित्य में बौद्ध धर्म के प्रभाव का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। इसमें कविता, कथा साहित्य, आत्मकथा और वैचारिक लेखन में बौद्ध चिंतन की उपस्थिति को सामाजिक न्याय, नैतिक प्रतिरोध और मानवीय करुणा के संदर्भ में समझने का प्रयास किया गया है। समकालीन लेखन में बौद्ध दृष्टि केवल धार्मिक प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि एक वैचारिक उपकरण के रूप में कार्य करती है, जो अन्याय और हिंसा के विरुद्ध विवेकपूर्ण प्रतिरोध की भाषा विकसित करती है। विशेष रूप से सामाजिक यथार्थ, आत्मानुभूति और वैकल्पिक विमर्शों में बौद्ध विचार आत्ममुक्ति और नैतिक पुनर्संरचना की दिशा में सक्रिय दिखाई देते हैं। यह अध्ययन यह स्थापित करता है कि 21वीं सदी में हिंदी साहित्य बौद्ध धर्म से प्रेरणा लेकर एक अधिक मानवीय, समतामूलक और संवादधर्मी सांस्कृतिक चेतना का निर्माण कर रहा है। अंततः यह निष्कर्ष निकलता है कि बौद्ध धर्म आधुनिक हिंदी साहित्य के लिए केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए एक जीवंत वैचारिक शक्ति है।